महाकाल की शयन आरती कब होती है?
विश्व प्रसिद्ध श्री महाकाल मंदिर उज्जैन में स्थित है। यह 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है और विश्व का एकमात्र दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग है जिसकी भस्म आरती होती है। प्रतिदिन प्रातः काल 4:00 बजे भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, यह एक अनूठी प्रक्रिया है और इसके साक्षी सारे श्रद्धालु बनना चाहते हैं। श्री महाकाल की भस्म आरती के लिए पास पहले से बुकिंग करने पर ही उपलब्ध है बिना पास के महाकाल मंदिर में भस्म आरती के समय प्रवेश वर्जित है।
शयन आरती
श्री महाकालेश्वर की दिन में पांच आरती की जाती है उसमें शयन आरती अंतिम होती है। यह आरती गर्मियों में 10:30 बजे और दीपावली के बाद सर्दियों में रात 10:00 बजे होती है। इस आरती के पश्चात भगवान श्री महाकाल के दर्शन पट बंद हो जाते हैं और फिर सुबह 4:00 बजे भस्म आरती के पहले खुलते है।

भगवान महाकालेश्वर की शयन आरती का अनुभव बहुत ही रोमांचकारी होता है। यह आरती ढोल धमाकों के साथ की जाती है जिसमें नित्य दर्शनार्थी कोरस में आरती और भजन गाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर देते हैं। यह एक ना भूल सकते वाला और अद्भुत अनुभव है। भगवान श्री महाकाल के प्रत्येक भक्त को जीवन में एक बार यह आरती जरूर देखना चाहिए। जय श्री महाकाल।।
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भस्म आरती में महाकाल का गणेश स्वरूप श्रृंगार:भगवान को तिलक और चन्दन अर्पित, फल और मिष्ठान्न का लगाया भोग
विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में बुधवार सुबह चार बजे मंदिर के पट खुलने के बाद पण्डे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित भगवान की सभी प्रतिमाओं का पूजन कर भगवान महाकाल का जलाभिषेक और दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से पूजन किया। इसके बाद प्रथम घंटाल बजाकर हरि ओम का जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के बाद भगवान को तिलक अर्पित कर ड्रायफ्रूट और भांग से गणेश स्वरूप में श्रृंगार किया गया।

श्रृंगार पूरा होने के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढांक कर भस्मी रमाई गई। भगवान महाकाल का भांग, ड्रायफ्रूट, चन्दन, आभूषण और फूलों से श्रृंगार किया गया। भस्म अर्पित करने के पश्चात शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ सुगन्धित पुष्पों की माला अर्पित की गई। भगवान को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया।

भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की और से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है की भस्म अर्पित करने के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं।
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चौबीस खंभा माता मंदिर उज्जैन में कहां पर है?
चौबीस खंभा माता मंदिर गोपाल मंदिर से श्री महाकालेश्वर मंदिर जाने के मार्ग पर गुदरी चौराहे के निकट स्थित है। यह एक बड़े दरवाजे नुमा आकृति है जो किसी नगर के प्रवेश द्वार सा प्रतीत होता है इस दरवाजे के दोनों तरफ महामाया और महानाया माता का मंदिर है।
यह दरवाजा दसवीं शताब्दी में बनाया गया था और अपनी बनावट से परमार कालीन होना पाया गया है। विशाल दरवाजे के पीछे चौबीस खंभे बने हुए जो इस आकृति को मजबूत बनाते हैं इन्हीं चौबीस खंबे और दरवाजे के दोनों तरफ बने माता मंदिर की वजह से चौबीस खंबा माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। निम्नलिखित श्लोक से भी यह साक्ष्य मिलता है कि यह नगर द्वारा होगा
सहस्र पद विस्तीर्ण महाकाल वनं शुभम।
द्वार माहघर्रत्नार्द्य खचितं सौभ्यदिग्भवम्।।
इस श्लोक से विदित होता है कि एक हजार पैर विस्तार वाला महाकाल-वन है जिसका द्वार बेशकीमती रत्नों से जड़ित रत्नों से जड़ित उत्तर दिशा को है। इसके अनुसार उत्तर दिशा की ओर यही प्रवेश-द्वार है।
चौबीस खंभा माता मंदिर

प्राचीन समय में इन मंदिरों में पशु बलि की जाती थी इसके साक्ष्य मिले परंतु इन कुरीतियों को बाद में बंद कर दिया गया। नवरात्र की अष्टमी को जो नगर पूजा की जाती है उसकी शुरुआत उज्जैन के कलेक्टर चौबीस खंभा माता मंदिर से करते हैं। उस दिन यहां मदिरा और गेहूं चने से बनी गई घुघरी का भोग चढ़ाया जाता है क्योंकि इसे तामसी भोजन माना गया है।
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भस्म आरती में महाकाल का राजा स्वरूप श्रृंगार:त्रिनेत्र धारी भगवान को मोर पंख, रजत मुकुट और त्रिपुण्ड अर्पित
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में मंगलवार तड़के चार बजे मंदिर के कपाट खोलने के पश्चात भगवान महाकाल को गर्म जल से स्नान कराया गया। इसके बाद पण्डे-पुजारियों ने दूध, दही, घी, शहद, फलों के रस से बने पंचामृत से बाबा महाकाल का अभिषेक पूजन किया। भगवान महाकाल के मस्तक पर रजत चंद्र, वैष्णव तिलक, मोर पंख, त्रिपुण्ड और त्रिनेत्र अर्पित कर श्रृंगार किया गया।

भस्म आरती के दौरान महाकाल को भांग, चन्दन,सिंदूर और आभूषण अर्पित किए गए। भस्म अर्पित कर कपूर आरती की गई। भगवान को नैवेद्य अर्पित किया गया। मस्तक पर चन्दन का तिलक और सिर पर शेषनाग का रजत मुकुट धारण कर रजत की मुंडमाला और रजत जड़ी रुद्राक्ष की माला के साथ सुगन्धित फूलों की माला अर्पित की गई। फल और मिष्ठान्न का भोग लगाया।

भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की और से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित करने के पश्चात बाबा महाकाल की भस्म आरती सम्पन्न हुई।
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राम घाट
श्री रामघाट उज्जैन के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध घाटों में से एक है। यह पुण्य सलिला मां शिप्रा के तट पर स्थित है। यह घाट कुंभ मेले के चार प्रमुख स्थानों में से एक है। कुंभ मेले में लाखों श्रद्धालु यहीं डुबकी लगाते है। उज्जैन में मनाए जाने वाले सभी स्नान पर्वों पर यहा डुबकी लगाने का विशेष महत्व है।
राम घाट
श्री राम घाट उज्जैन के क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित वो घाट है जहां पर भगवान श्री राम ने अपने पिता दशरथ के मृत्यु के पश्चात उनकी आत्मा को शांति के लिए उनके निमित्त पिंड दान, श्राद्ध और तर्पण उज्जैन के इसी घाट पर किया था तब से इस घाट का नाम राम घाट पड़ गया ।
मां क्षिप्रा को मध्य प्रदेश की गंगा के नाम से भी जाना जाता है वेदों में क्षिप्रा का अत्याधिक महत्व बताया गया। मां क्षिप्रा के पावन जल में स्नान कर भक्त लोग अपने जीवन को धन्य बनाते हैं और पापो से मुक्त हो जाते हैं।
राम घाट पर आकर श्रद्धालु अपनों की मृत्यु उपरांत अस्थि विसर्जन के लिए और पिंड दान के लिए भी आते हैं।
यहीं पर प्राचीन यमराज, चित्रकूट मंदिर बना हुआ है। अगर आपको पितृ देवताओं का तर्पण और मृत प्राणी की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान करना हो तो आपको उज्जैन के रामघाट मंदिर पर आकर उनके लिए रामघाट पर पिंड दिन जरूर करना चाहिए।

यहा़ पर विप्र, पंडित चावल के आटे का पिंड दान पितरों के निमित्त किया जाता है जिससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है।
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भस्म आरती में महाकाल को वैष्णव तिलक अर्पित:आभूषण, रुद्राक्ष माला, रजत मुकुट,भांग और ड्रायफ्रूट से भगवान का मनमोहक श्रृंगार
विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार तड़के भस्म आरती के लिए मंदिर के कपाट खोले गए। सबसे पहले सभा मंडप में वीरभद्र जी के कान में स्वस्ति वाचन कर घंटी बजाकर भगवान से आज्ञा लेकर सभा मंडप वाला चांदी का पट खोला गया। गर्भगृह के पट खोलकर पुजारी ने भगवान का श्रृंगार उतार कर पंचामृत पूजन के बाद कपूर आरती की। नंदी हाल में नंदी जी का स्नान,ध्यान, पूजन किया गया। जल से भगवान महाकाल का अभिषेक करने के पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से पूजन किया गया।

भगवान महाकाल को वैष्णव तिलक, आभूषण, रुद्राक्ष माला और रजत मुकुट अर्पित कर श्रृंगार किया। भांग, चन्दन, ड्रायफ्रूट और भस्म चढ़ाई गई। भगवान महाकाल ने शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ-साथ सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला धारण की। फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की और से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है की भस्म अर्पित करने के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में दर्शन देते है।

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भगवान महाकाल की भस्मारती में प्रयोग की जाने वाली भस्म कहा से लाई जाती है?
महाकालेश्वर मंदिर में प्रातः काल 4:00 बजे होने वाली आरती को भस्म आरती कहा जाता है। इस आरती में दिगंबर स्वरूप भगवान श्री महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। यह आरती एक अद्वितीय अनुभव है जो विश्व में कहीं और देखा नहीं जाता है। भस्म आरती के बारे में कई सारी कहानियां और किंवदंतियां प्रचलित है।
जितने मुख उतनी बातें यह कहावत चरितार्थ होती है जब बात महाकालेश्वर के भस्म की आती है हर कोई अपना एक नया संस्करण प्रस्तुत करता है। भगवान श्री महाकाल को चढ़ने वाली भस्म कहां से लाई जाती है कुछ लोग कहते हैं के शमशान में जलने वाली चिताओं की भस्म है परंतु मंदिर के पुजारी कहते हैं यह गाय की गोबर से बनाए गए उपलों से तैयार की गई भस्म है जो सिर्फ महाकाल को अर्पित करने के लिए ही तैयार की जाती है।
महाकाल मंदिर मैं तीन तल है, भूतल पर स्थित श्री ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे धूनी का कमरा है, जहां अखंड धूनी जल रही है। उसे धुनी में बनने वाली भस्म को ही सूती कपड़े से छान कर भगवान श्री महाकालेश्वर को अर्पण करने के लिए भस्म तैयार की जाती है।
श्री महाकालेश्वर मंदिर महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा का निर्वहन करता है। इसी अखाड़े से संबंधित साधु गण इस भस्म को तैयार करते हैं और भगवान श्री महाकाल को अर्पित करते हैं। हमारे देश में आज भी कुछ मुख्य परंपरा अखाड़ों के द्वारा प्रबंधन की जाती है।
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बरगद के पेड़ का महत्व
सनातन में बरगद के पेड़ का महत्व
सनातन के अनुसार बरगद के पेड़ का महत्व बहुत बड़ा है। ऐसा मन जाता है के बरगद के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास होता है। वेदों के अनुसार बरगद के पेड़ की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं एवं लताओं में शिव का निवास होता है। बरगद के पेड़ के नीचे घी का दीपक जलाने से त्रिदेव प्रसन्न हो जाते हैं।
बरगद के पेड़ को अक्षय वृक्ष भी कहा जाता है क्योंकि यह बहुत लंबे समय या वर्षो तक जीवित रहता है और वातावरण में शुद्ध प्राणवायु छोड़ता रहता है।
सनातन धर्म हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है और सनातन धर्म में हम हर जगह भगवान का वास देखते हैं। वृक्षों में भी भगवान का वास मानते हुए हम उनकी पूजा करते हैं और नित्य जीवन में भी हमने वृक्षों को और प्रकृति को सम्मिलित किया हुआ है। पशु पक्षी के साथ-साथ संसार में पाए जाने वाले हर कण में हम भगवान को खोजते हैं और उन्हें भगवान का रूप मानते हुए किसी न किसी रूप में पूजते हैं।

कई व्रत और अनुष्ठान बरगद के वृक्ष के बिना अधूरा है जैसे वट सावित्री अमावस्या। तुम्हारे पुराने ग्रंथ और साहित्य भी वट वृक्ष को मोक्ष दायक मानते हुए इसके नीचे तप करने की महत्वता को दर्शाता है। भगवान बुद्ध को भी इसी तरह एक वटवृक्ष के नीचे मोक्ष या ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। कई ऋषि मुनि और साधक वट वृक्ष के नीचे तप करके ज्ञानी बनें।
जब मकान का और सुविधाओं का अभाव हुआ करता था तब भी जीवन में हमने प्रकृति को सम्मिलित और समाहित किया हुआ था। उदाहरण के तौर पर देखें हर मंदिर में एक बरगद का पेड़ जरूर होता है और उसकी छाया में हम कुछ देर बैठकर मन को शांत करते हैं। इसी प्रकार हर विद्यालय, आश्रम, धर्मशाला, पार्क, मोहल्ला और रास्तों पर हमें वट वृक्ष मिलते हैं जो सदियों पुराने है। यह वृक्ष हमें बताते हैं की इन्हीं की छाया का हमने कई तरह से उपयोग किया है।
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भृतहरि गुफ़ा उज्जैन में कहां स्थित है ?
उज्जैन में राजा भृतहरि गुफ़ा शिप्रा तट पर गढ़कालिका मंदिर के पास स्थित है। यह नाथ संप्रदाय का एक बड़ा केंद्र है यहां राजा भृतहरि और उनके भांजे श्री गोपीनाथ की गुफाएं है जहां उन्होंने तप किया था।
राजा भृतहरि सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई थे और उज्जैन में उन्हीं का शासन था परंतु एक ऐसी घटना घटी जिस के पश्चात उन्होंने वैराग्य ले लिया और उन्होंने अपना राजपाट सम्राट विक्रमादित्य को सौंप दिया।
राजा भृतहरि ने शिप्रा नदी के तट पर एक छोटी पहाड़ी पर 12 वर्षों तक कठोर तप किया। यह तप देखकर देवराज इंद्र मैं उनकी तपस्या भंग करने हेतु गुफा को धान का प्रयास किया जिसे तकलीफ राजा भृतहरि ने अपने एक हाथ से रोक दिया। उनके हाथ से बना निशान आज भी गुफा में स्थित है लोग उसे छूट भी हैं।
कालीकाजी के मंदिर जिसे गढ़कालिका मंदिर के नाम से जाना जाता है के पास में बनी हुई है।
राजा भृतहरि गुफ़ा

भृतहरि एक प्रकांड पंडित थे कहा जाता है की राजा भृतहरि को अमरता का वरदान है। अपनी पत्नी के गलत राह पर जाने के चलते उन्होंने अपना संपूर्ण साम्राज्य राजा विक्रमादित्य को सौप कर सन्यास ग्रहण कर लिया।
राजा भृतहरि ने जिस गुफ़ा में तपस्या की थी उसी गुफ़ा को भृतहरि गुफ़ा के नाम से जाना जाता है इस गुफा के अंदर से चार धाम का मार्ग धरती के अंदर -अंदर होकर जाता है किंतु इस समय यह मार्ग बंद है।
यहां कुल दो गुफाएं है साथ ही राजा भृतहरि की समाधि भी यहां पर बनी हुई है।
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तुलसी की पूजा क्यों की जाती है?
सनातन धर्म में हम प्रकृति के हर घटक को देवतुल्य मानते हुए पूजते है। प्रकृति से हमारा प्रेम यूं ही नहीं है, हमने पशु, पक्षी, वृक्ष और पत्थरों को भी हमने देवता माना है। प्रकृति से मिले हर एक घटक को हमने अपने जीवन में एक उच्च स्थान दिया है। वैसे तो हम कई वृक्षों को पूजते हैं परंतु तुलसी का स्थान सब उच्चतम है।
तुलसी जिसे हम वृंदा के नाम से भी जाना जाता है भगवान श्री कृष्ण को प्राणतुल्य प्रिय है। तुलसी पत्र के बिना भगवान के सारे भोग अधूरे है। मंदिरों और घरों में विराजित श्री हरि विष्णु के सभी अवतारों और उनके विद्रोह को बिना तुलसी के भोग वर्जित है जो भगवान को भी अस्वीकार्य है।
तुलसी हर आंगन की शोभा है हर आंगन, हर घर, हर परिवार तुलसी के बिना अधूरा है यह हमारे जीवन में एक अनिवार्य वस्तु की तरह घुली मिली है। हमारे साहित्य और बोलचाल में भी तुलसी का बड़ा महत्व है “मैं तुलसी तेरे आंगन की” एक मुहावरे के रूप में प्रसिद्ध है और इसका उपयोग साहित्य, सिनेमा और हमारी दिनचर्या में कई बार हुआ है।
जब हनुमान जी माता सीता का पता लगाने के लिए लंका गए थे तब भी रावण के छोटे भाई विभीषण के आंगन में तुलसी होने का विवरण है। विभीषण एक एक सच्चरित्र ब्राह्मण थे और भगवान के भक्त भी थे। सनातन में हमने तुलसी को हमारे उत्सव और त्यौहार में भी सम्मिलित किया हुआ है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में होने वाला तुलसी विवाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
वैज्ञानिक कारण – वास्तव में तुलसी अत्यधिक प्राणवायु या ऑक्सिजन देने वाला और औषधीय महत्व रखने वाला पौधा है। इसका उपयोग सर्दी और जुखाम के इलाज़ के लिए किया जाता है। तुलसी की माला हर श्री कृष्ण भक्ति के गले की शोभा बनती है बिना तुलसी के राधा कृष्ण का नाम अधूरा है। तुलसी की माला जिसका उपयोग जप करने के लिए भी होता है इसी के साथ तुलसी की लकड़ी का उपयोग तिलक लगाने में भी किया जाता है। इन्हीं कर्म के चलते हिंदू धर्म में इसे आंगन और बगीचे में लगाया जाता है।
सनातन धर्म संस्कृति में तुलसी एक वस्तु या पौधे से बढ़कर बहुत कुछ है इन सब बातें को जानने के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहे। एक अलग ब्लॉक में हम तुलसी और श्री कृष्ण के संबंध में विस्तार से लिखेंगे। हमसे जुड़ने के लिए धन्यवाद
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माँ महागौरी – नवरात्रि की आठवीं देवी
माँ कूष्मांडा – नवरात्रि की चौथी देवी
माँ चंद्रघंटा – नवरात्रि की तीसरी देवी
माँ स्कन्दमाता – नवरात्रि की पाँचवीं देवी
माँ कात्यायनी – नवरात्रि की छठी देवी
माँ कालरात्रि – नवरात्रि की सातवीं देवी
माँ शैलपुत्री – नवरात्रि की प्रथम देवी




















