भस्म आरती में महाकाल का राजा स्वरूप श्रृुंगार:भगवान को त्रिपुण्ड, त्रिशूल, चंद्र के साथ आभूषण और पुष्प अर्पित
विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती के लिए रविवार तड़के चार बजे मंदिर के पट खोले गए। पण्डे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित भगवान की सभी प्रतिमाओं का पूजन कर भगवान महाकाल का जलाभिषेक और दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से पूजन किया। इसके बाद प्रथम घंटाल बजाकर हरि ओम का जल अर्पित किया गया।

कपूर आरती के बाद भगवान के मस्तक पर भांग, चन्दन और त्रिपुण्ड अर्पित कर श्रृंगार किया गया। श्रृंगार पूरा होने के बाद ज्योतिलिंग को कपड़े से ढांक कर भस्मी रमाई गई। भगवान महाकाल का भांग, ड्रायफ्रूट, चन्दन, आभूषण और फूलों से राजा स्वरूप श्रृंगार किया गया।
भस्म अर्पित करने के पश्चात शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ-साथ सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला अर्पित की गई। भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की और से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है की भस्म अर्पित करने के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में दर्शन देते है।

उज्जैन में आठ या अष्ट भैरव कौन से है?
इस वर्ष 23 नवंबर शनिवार को भैरवाष्टमी है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अगहन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मध्यरात्रि में भैरव का जन्म हुआ था इसलिए इसे भैरव जयंती भी कहते है। महाकाल की नगरी में भैरव पूजा का विशेष मान्यता है।
स्कंद पुराण के अवंति खंड के अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव का उल्लेख मिलता है। भैरव अष्टमी के अवसर पर उज्जैन में अष्ट भैरव की यात्रा का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन अष्ट भैरव की यात्रा तथा दर्शन पूजन करने से मनवांछित फल मिलता है और समस्त प्रकार के भाई से मुक्ति मिलती है।
भैरव तंत्र का कथन है कि जो भय से मुक्ति दिलाए वह भैरव है।
क्या है भैरव का मूल स्थान :- श्मशान तथा उसके आसपास का एकांत जंगल ही भैरव का मूल स्थान है। संपूर्ण भारत में मात्र उज्जैन ही एक ऐसा स्थल है, जहां ओखलेश्वर तथा चक्रतीर्थ श्मशान हैं। अष्ट भैरव (अष्ट महाभैरव) इन्हीं स्थानों पर विराजमान है।
स्कंद पुराण में लिखे अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव निम्न स्थानों पर विराजमान है। जानिए कहां-कहां है उनका स्थान :-
1. भैरवगढ़ में श्री काल भैरव – विश्व प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर जिन्हें भगवान महाकाल के सेनापति के रूप में भी जाना जाता है। यहां भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है।

2. चक्र तीर्थ शमशान में स्थित बम बटुक भैरव – उज्जैन के प्रमुख शमशान को तीर्थ की संज्ञा दी गई है माना जाता है यहां पर दाह संस्कार के बाद जीवन मृत्यु चक्र से मुक्ति मिल जाती है इसीलिए इस चक्र तीर्थ भी कहते हैं। बम बटुक भैरव इसी शमशान में विराजित देवता है।
3. रामघाट के समीप स्थित आनंद भैरव – श्री आनंद भैरव मंदिर शिप्रा नदी की छोटी रपट (पुल) के बाईं ओर प्रसिद्ध रामघाट मार्ग पर ही स्थित है। यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बाहर से तो अति प्राचीन नहीं दिखता है, किन्तु देव-प्रतिमा के दर्शन करने तथा प्रतिमा के दाएं और बाएं विद्यमान मूर्तियों एवं स्तंभों की अंशत: दृष्टव्य आकृतियों के आधार पर नि:संदिग्ध रूप से अति प्राचीन लगता है।

4. दंड पाणी भैरव – यह मंदिर शिप्रा तट के पास स्थित कालिदास उद्यान के मध्य भाग में स्थित है। करीब 450 वर्गफीट के चारों ओर 3 फीट ऊंची दीवारों तथा 12 फीट ऊंची छत तक चौतरफा लोहे के सरियों से अभिरक्षित कक्ष के मध्य स्थित केवल 20 वर्गफीट के गर्भगृह में भैरवजी की सिंदूरचर्चित मुण्डाकृति मूर्ति समतल भूमि पर पिण्डवत विराजित है। यह मंदिर भी मां क्षिप्रा नदी के किनारे पर स्थित है।

5. ओखलेश्वर शमशान पर स्थित विक्रांत भैरव – कालभैरव के निकट ओखलेश्वर शमशान पर स्थित विक्रांत भैरव क्षिप्रा नदी के किनारे विराजमान हैं। ओखलेश्वर शमशान एक जागृत शमशान माना जाता है और वहां विराजने वाले श्री विक्रांत भैरव तंत्र के देवता के रूप में जाने जाते हैं। यहां प्रतिदिन तांत्रिक क्रियाएं होती रहती है।

6. काला गौरा – मुख्य मार्ग ढाबा रोड़ पर गेबी हनुमान मंदिर की गली के सामने से आपको भैरवजी के दो मंदिर दिखाई देंगे। इनमें दाईं ओर स्थित मंदिर में श्री काला भैरव की मूर्ति सड़क मार्ग से करीब 2 फीट ऊंचे गर्भगृह में टाइल्स जड़े फर्श पर स्थापित है। गर्भगृह में यह मूर्त्ति बाई ओर हटकर स्थापित है जबकि दाई ओर स्थान खाली पड़ा है। बाई ओर गोरा भैरव की प्रतिमा है। छोटा-सा यह मंदिर भी सड़क से करीब ड़ेढ़ फीट ऊंचा है। यह मूर्ति भी जागृत है।

7. चक्रपाणि भैरव, श्री बटुक भैरव – स्कन्द महापुराण में महादेव ने देवी पार्वती को अवन्ती क्षेत्र के अष्ट भैरवों के जो नाम बताए, उनमें पांचवें क्रम पर श्री बटुक भैरव का नाम बताया गया है। मंदिर शिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन शहर के प्रमुख श्मशान चक्रतीर्थ के ठीक पहले बाईं ओर ऊपर ही बना है जिसके द्वार से होकर दाईं ओर जाने पर कुछ सीढ़ियां उतरकर पूर्वाभिमुखी बटुक भैरव के मुण्ड स्वरूप में बाल छवि के दर्शन होते हैं।

8. श्री महाभैरव आताल-पाताल भैरव – स्कन्द महापुराण के अवन्ती-माहात्म्य-खण्ड में यह मंदिर सिंहपुरी में बताया है। इनका यह नाम इस माने में अर्थसिद्ध है क्योंकि इसकी मूल आकृति का आधा निचला भाग भूमिगत तथा ऊपरी आधा भाग ऊपर था। देवमूर्ति पिण्डात्मक एवं सिंदूरचर्चित है तथा महाभैरवजी का केवल मुण्ड ही दिखाई देता है। यह मंदिर अति प्राचीन होने से भगवान महाभैरव द्वारा भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण की जाती हैं।

अष्ट भैरव-साधना से पीड़ामुक्ति
शनि, राहु, केतु तथा मंगल ग्रह से जो जातक पीड़ित हैं, उन्हें भैरव की साधना अवश्य ही करनी चाहिए। अगर जन्मपत्रिका में मारकेश ग्रहों के रूप में यदि उक्त चारों ग्रहों में से किसी एक का भी प्रभाव दिखाई देता हो तो भैरव जी का पंचोपचार पूजन जरूर करवाना चाहिए। भैरव के जाप, पठनात्मक एवं हवनात्मक अनुष्ठान मृत्युतुल्य कष्ट को समाप्त कर देते हैं।
शुक्रवार के भस्म आरती दर्शन:महाकाल को चन्दन, भांग, पुष्प और रजत मुकुट अर्पित कर राजा स्वरूप श्रृंगार
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में शुक्रवार तड़के चार बजे मंदिर के कपाट खोलने के पश्चात भगवान महाकाल को जल से स्नान कराया गया। इसके बाद पण्डे-पुजारियों ने दूध, दही, घी, शहद फलों के रस से बने पंचामृत से बाबा महाकाल का अभिषेक पूजन किया। चन्दन भांग पुष्प मोरपंख रजत मुकुट अर्पित कर भगवान महाकाल का राजा स्वरुप में श्रृंगार किया गया।

भस्म आरती के दौरान महाकाल की कपूर आरती कर भोग लगाया, मन्त्रोच्चार के साथ भगवान को भांग, चन्दन, सिंदूर और आभूषण अर्पित किए गए। मस्तक पर चन्दन का तिलक और शेषनाग का रजत मुकुट धारण कर रजत की मुंडमाला और रजत जड़ी रुद्राक्ष की माला के साथ-साथ सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला अर्पित की गई।
फल और मिष्ठान का भोग लगाया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई।

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भस्म आरती में महाकाल का गणेश स्वरूप में श्रृंगार:भगवान का रजत चंद्र, त्रिशूल, मुकुट और आभूषणों से आकर्षक श्रृंगार
विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में बुधवार तड़के भस्म आरती के दौरान मंदिर के कपाट खोले गए। सबसे पहले सभा मंडप में वीरभद्र जी के कान में स्वस्ति वाचन कर घंटी बजाकर भगवान से आज्ञा लेकर सभा मंडप वाले चांदी के पट खोला गया।

गर्भगृह के पट खोल कर पुजारी भगवान का श्रृंगार उतार कर पंचामृत पूजन के बाद कर्पूर आरती की। नंदी हाल में नंदी जी का स्नान,ध्यान, पूजन किया गया। जल से भगवान महाकाल का अभिषेक करने के पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से पूजन किया गया।
भगवान महाकाल का रजत चंद्र, त्रिशूल, मुकुट और आभूषण अर्पित कर श्रृंगार किया गया। भांग, चन्दन ड्रायफ्रूट और भस्म चढ़ाई गई। भगवान महाकाल ने शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ-साथ सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला धारण की।
त्रिपुण्ड, त्रिशूल और आभूषणों से बाबा महाकाल का भगवान गणेश स्वरूप में श्रृंगार किया गया। फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की और से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गयी। मान्यता है की भस्म अर्पित करने के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में दर्शन देते है।

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सोमवार के भस्म आरती दर्शन:महाकाल को रजत मुकुट, त्रिपुण्ड, रुद्राक्ष की माला और पुष्प अर्पित कर राजा स्वरूप श्रृंगार
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार तड़के चार बजे मंदिर के कपाट खोलने के पश्चात भगवान महाकाल को गर्म जल से स्नान कराया गया। इसके बाद पण्डे-पुजारियों ने दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से बाबा महाकाल का अभिषेक पूजन किया। भगवान महाकाल को चंद्र के साथ त्रिशूल त्रिपुण्ड और सुगंधित पुष्प अर्पित कर राजा स्वरूप श्रृंगार किया गया।

भस्म आरती के दौरान महाकाल का भांग, चन्दन, सिंदूर और आभूषणों से श्रृंगार किया गया। मस्तक पर चन्दन का तिलक और सिर पर शेषनाग का रजत मुकुट धारण कर रजत की मुंडमाला और रजत जड़ी रुद्राक्ष की माला के साथ साथ भगवान को सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला अर्पित की गई। फल और मिष्ठान का भोग लगाया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की और से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई।

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उज्जैन में अध्यात्म और साहित्य
सनातन धर्म में उज्जैन का स्थान उच्च कोटि का है। यहां ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ, महा शक्तिपीठ, अष्ट भैरव, 64 योगिनी, 84 महादेव, सप्त सागर और भी कई प्रसिद्ध एवं प्राचीन मंदिर स्थित है। उसके अलावा उज्जैन में कुंभ मेला लगता है जो की उज्जैन के उज्जैन के महत्व को और भी बढ़ा देते हैं। उज्जैन में बहने वाली मां शिप्रा का भी सनातन धर्म में एक विशेष महत्व है ऐसा माना जाता है। माता शिप्रा भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है।
अध्यात्म और साहित्य में भी उज्जैन का उल्लेख कई जगह मिलता है।
महाकवि कालिदास की सारी रचना उज्जैन को लेकर ही है। भगवान वेदव्यास रचित महाभारत में भी अवंतिका के रूप में उज्जैन का और उज्जैन के राजा का वर्णन है। भगवान श्री कृष्ण की विद्यास्थली उज्जैन में ही स्थित श्री सांदीपनि आश्रम है। उज्जैन से 15 किलोमीटर दूर नारायण गांव में श्री कृष्णा बलराम सुदामा का मंदिर उसे पल का साक्षी है जब भगवान श्री कृष्णा अपने भाई बलराम और सुदामा के साथ जंगल में लड़कियां तोड़ने गए थे।
ज्योतिष एवं ज्यामिति में भी उज्जैन का योगदान काम नहीं है। विक्रमादित्य के समय क्षपणक और वराहमिहिर ज्योतिष और ज्यामिति के प्रसिद्ध विद्वान थे जिनकी रचना आज भी जनमानस के पथ को प्रदर्शित करती है।
प्राचीन समय से ही उज्जैन काल गणना का एक प्रमुख केंद्र है। कर्क रेखा उज्जैन से होकर ही निकलती है इसका भी काल गणना में बड़ा महत्व है। उज्जैन के कई मंदिर काल गणना के बड़े केंद्र हैं महाकालेश्वर मंदिर में विराजित भगवान श्री शिव को भी महाकाल के रूप में ही जाना जाता है। महाकाल में हम भगवान को समय के रूप में ही पूजते है। मंगलनाथ मंदिर को मंगल ग्रह का जन्म स्थान माना जाता है साथ ही अगर आपकी कुंडली में मंगल दोष हो तो मंगलनाथ मंदिर में उसकी पूजा की जाती है जिसका भी ज्योतिष से ही संबंध है।

जयपुर के राजा जयसिंह ने उज्जैन में कालगणना के लिए ही जंतर मंतर की स्थापना करवाई थी और उज्जैन के जंतर मंतर के यंत्रों की क्षमता किसी से छुपी नहीं है। यह सारे यंत्र सटीक जानकारी देते हैं।
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उज्जैन में गोपाल मंदिर कहा पर स्थित है साथ ही इसकी क्या विशेषता है जो विश्व में अन्य किसी गोपाल मंदिर में देखने को नहीं मिलती?
गोपाल मंदिर
उज्जैन, सनातन धर्म की सात पवित्र नगरी जिन्हें हम सप्तपूरियों के नाम से भी जानते हैं में शामिल है। उज्जैन एक प्रसिद्ध तीर्थ है जिसका महत्व हर युग में लिखित है। सतयुग में राजा हरिश्चंद्र के जीवन वृतांत में उज्जैन का उल्लेख है वहीं त्रेता युग में भगवान राम भी उज्जैन और हुए है। द्वापर युग में तो उज्जैन भगवान श्री कृष्ण की विद्यास्थली के रूप के जाना जाता है और कलियुग में राजा विक्रमादित्य और महाकवि कालिदास की रचना भी उज्जैन के आस पास ही है।
प्राचीनता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भी उज्जैन से बहुत गहरा संबंध है। सम्राट विक्रमादित्य, राजा भोज, सम्राट अशोक के समय भी साहित्य में उज्जैन का उल्लेख कई जगह मिलता है। जब सिंधिया ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया तब उन्होंने उज्जैन में कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया और कई नए मंदिर बनाएं। गोपाल मंदिर नहीं नए बने हुए मंदिरों में से एक है जिसे राजमाता जीजाबाई ने बनवाया था। यह भगवान श्री कृष्ण के द्वारकाधीश स्वरूप को लेकर मनाया गया मंदिर है जिसका विग्रह बहुत ही मनमोहक है और द्वारकाधीश भगवान से कृष्ण की छवि को कल शालिग्राम के पत्थर पर प्रदर्शित करती है।

गोपाल मंदिर उज्जैन के सबसे व्यस्ततम मार्केट में स्थित है मानो पूरे बाजार के स्वामी भगवान श्री गोपाल है। मंदिर के दाएं और पूजा और भक्ति स्टोर्स बने हुए हैं और मंदिर के बाई तरफ बर्तन बाजार और सराफा बाजार स्थित है। मंदिर के बिल्कुल सामने छत्री चौक है जो उज्जैन के सबसे व्यस्ततम चौराहों में एक है। यहां एक फुटपाथ मार्केट भी लगता है। इस क्षेत्र में सभी तरह के वस्त्र और अलंकरण मिलते हैं।
संसार का एक मात्र ऐसा स्थान है जहां पर हरी -हर मिलन अर्थात भगवान शिव की शाही सवारी जब एक विशेष दिन यहां से निकलती है तो शिव जो और कृष्ण जी का मिलन प्राचीन काल से ही उज्जैन के गोपाल मंदिर में करवाया जाता है।
भगवान कृष्ण यहां पर पूर्व मुख करके विराजमान हैं और एक विशेष प्रकार का हीरा भी यहां पर भगवान की दाढ़ी में लगाया जाता है जो की बेशकीमती है। गोपाल मंदिर में भगवान शिव और गरुड़ की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं।
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रविवार के भस्म आरती दर्शन:भगवान महाकाल को भांग, चन्दन, त्रिपुण्ड और त्रिनेत्र अर्पित कर राजा स्वरूप श्रृंगार
विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में रविवार तड़के भस्म आरती के दौरान चार बजे मंदिर के पट खुलते ही पण्डे-पुजारी ने गर्भगृह में स्थापित सभी भगवान की प्रतिमाओं का पूजन कर भगवान महाकाल का जलाभिषेक और दूध, दही, घी, शक्कर के साथ फलों के रस से बने पंचामृत पूजन किया। इसके बाद प्रथम घंटाल बजाकर हरि ओम का जल अर्पित किया गया।
कपूर आरती के बाद भगवान के मस्तक पर भांग, चन्दन और त्रिपुण्ड और त्रिनेत्र अर्पित कर श्रृंगार किया गया।

श्रृंगार पूरा होने के बाद ज्योतिलिंग को कपड़े से ढांककर भस्मी रमाई गई। भगवान महाकाल का भांग, ड्रायफ्रूट, चन्दन, आभूषण और फूलों से राजा स्वरूप श्रृंगार किया गया। भस्म अर्पित करने के पश्चात शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ-साथ सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला अर्पित की। गेंदा और गुलाब के सुगंधित पुष्प भगवान महाकाल को अर्पित किए। फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया

भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गयी। मान्यता है की भस्म अर्पित करने के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में दर्शन देते है।
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भस्म आरती के बाद महाकाल का राजा स्वरुप श्रृंगार
महाकाल का राजा स्वरुप श्रृंगार – बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में शनिवार तड़के चार बजे मंदिर के कपाट खोलने के पश्चात भगवान महाकाल को गर्म जल से स्नान कराया। पण्डे-पुजारियों ने दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से बाबा महाकाल का अभिषेक पूजन किया। हरिओम का जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के बाद भगवान के मस्तक पर डायमंड जड़ित त्रिपुण्ड, त्रिनेत्र और चंद्र के साथ भांग-चन्दन अर्पित कर महाकाल का राजा स्वरूप श्रृंगार किया गया।
महाकाल का राजा स्वरुप श्रृंगार
भस्म अर्पित करने के पश्चात, भगवान महाकाल को ड्रायफ्रूट के साथ भोग अर्पित कर कपूर आरती की गई। शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ साथ सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला अर्पित की गई। भगवान महाकाल ने कमल और गुलाब के सुगंधित पुष्प धारण किए। फल और मिष्ठान का भोग लगाया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई।

भस्म आरती बुकिंग
श्री महाकालेश्वर की भस्म आरती की ऑनलाइन और ऑफलाइन इन दो माध्यमों से ही होती है। प्रतिदिन 1400 लोगों को भस्म आरती में सम्मिलित होने की परमिशन जारी की जाती है। यह दोनों, ऑफ ऑनलाइन और ऑफलाइन को मिला कर है। पहले यह रजिस्ट्रेशन निशुल्क होता था परंतु कोविड के पश्चात ऑनलाइन बुकिंग के ₹200 प्रति व्यक्ति चार्ज किया जाता है ऑफलाइन ₹100 लिया जाता है।
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भस्म आरती
भगवान महाकाल का भांग चन्दन और मोतियों से बने त्रिपुण्ड और त्रिनेत्र से श्रृंगार किया गया। भांग, चन्दन, ड्रायफ्रूट और भस्म चढ़ाई गई। शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ-साथ सुगन्धित पुष्प से बनी फूलों की माला धारण कर भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार हुआ। फल और मिष्ठान का भोग लगाया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है की भस्म अर्पित करने के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में दर्शन देते है।

भस्म आरती बुकिंग
श्री महाकालेश्वर की भस्म आरती की ऑनलाइन और ऑफलाइन इन दो माध्यमों से ही होती है। प्रतिदिन 1400 लोगों को भस्म आरती में सम्मिलित होने की परमिशन जारी की जाती है। यह दोनों, ऑफ ऑनलाइन और ऑफलाइन को मिला कर है। पहले यह रजिस्ट्रेशन निशुल्क होता था परंतु कोविड के पश्चात ऑनलाइन बुकिंग के ₹200 प्रति व्यक्ति चार्ज किया जाता है ऑफलाइन ₹100 लिया जाता है।
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माँ चंद्रघंटा – नवरात्रि की तीसरी देवी
माँ स्कन्दमाता – नवरात्रि की पाँचवीं देवी
माँ कात्यायनी – नवरात्रि की छठी देवी
माँ कालरात्रि – नवरात्रि की सातवीं देवी
माँ शैलपुत्री – नवरात्रि की प्रथम देवी




















