गोपाल मंदिर
उज्जैन, सनातन धर्म की सात पवित्र नगरी जिन्हें हम सप्तपूरियों के नाम से भी जानते हैं में शामिल है। उज्जैन एक प्रसिद्ध तीर्थ है जिसका महत्व हर युग में लिखित है। सतयुग में राजा हरिश्चंद्र के जीवन वृतांत में उज्जैन का उल्लेख है वहीं त्रेता युग में भगवान राम भी उज्जैन और हुए है। द्वापर युग में तो उज्जैन भगवान श्री कृष्ण की विद्यास्थली के रूप के जाना जाता है और कलियुग में राजा विक्रमादित्य और महाकवि कालिदास की रचना भी उज्जैन के आस पास ही है।
प्राचीनता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भी उज्जैन से बहुत गहरा संबंध है। सम्राट विक्रमादित्य, राजा भोज, सम्राट अशोक के समय भी साहित्य में उज्जैन का उल्लेख कई जगह मिलता है। जब सिंधिया ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया तब उन्होंने उज्जैन में कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया और कई नए मंदिर बनाएं। गोपाल मंदिर नहीं नए बने हुए मंदिरों में से एक है जिसे राजमाता जीजाबाई ने बनवाया था। यह भगवान श्री कृष्ण के द्वारकाधीश स्वरूप को लेकर मनाया गया मंदिर है जिसका विग्रह बहुत ही मनमोहक है और द्वारकाधीश भगवान से कृष्ण की छवि को कल शालिग्राम के पत्थर पर प्रदर्शित करती है।

गोपाल मंदिर उज्जैन के सबसे व्यस्ततम मार्केट में स्थित है मानो पूरे बाजार के स्वामी भगवान श्री गोपाल है। मंदिर के दाएं और पूजा और भक्ति स्टोर्स बने हुए हैं और मंदिर के बाई तरफ बर्तन बाजार और सराफा बाजार स्थित है। मंदिर के बिल्कुल सामने छत्री चौक है जो उज्जैन के सबसे व्यस्ततम चौराहों में एक है। यहां एक फुटपाथ मार्केट भी लगता है। इस क्षेत्र में सभी तरह के वस्त्र और अलंकरण मिलते हैं।
संसार का एक मात्र ऐसा स्थान है जहां पर हरी -हर मिलन अर्थात भगवान शिव की शाही सवारी जब एक विशेष दिन यहां से निकलती है तो शिव जो और कृष्ण जी का मिलन प्राचीन काल से ही उज्जैन के गोपाल मंदिर में करवाया जाता है।
भगवान कृष्ण यहां पर पूर्व मुख करके विराजमान हैं और एक विशेष प्रकार का हीरा भी यहां पर भगवान की दाढ़ी में लगाया जाता है जो की बेशकीमती है। गोपाल मंदिर में भगवान शिव और गरुड़ की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं।
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