भगवान चिंतामण गणेश के दर्शन से क्या लाभ होता है?

भगवान चिंतामण गणेश के दर्शन से भक्तों को कई प्रकार के लाभ और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान चिंतामण गणेश “चिंताओं को हरने वाले” और “संकट मोचक” हैं। उनके दर्शन और पूजा से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

1. चिंता और बाधाओं का निवारण

भगवान चिंतामण के दर्शन से मानसिक शांति मिलती है। जीवन में आने वाली बाधाएं, समस्याएं, और मानसिक तनाव दूर होते हैं।

2. सौभाग्य और सफलता

गणेश जी को ‘विघ्नहर्ता’ कहा जाता है। उनकी कृपा से जीवन में आने वाले सभी विघ्न और रुकावटें समाप्त हो जाती हैं, जिससे कार्यों में सफलता मिलती है।

3. परिवार में सुख-शांति

चिंतामण गणेश की पूजा से परिवार में आपसी प्रेम, समझ, और शांति बनी रहती है।

4. आर्थिक समृद्धि

भगवान गणेश को समृद्धि और सौभाग्य का देवता माना जाता है। उनकी कृपा से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।

5. विद्या और बुद्धि का विकास

गणेश जी को विद्या और बुद्धि का देवता माना जाता है। छात्रों और ज्ञान की प्राप्ति के इच्छुक लोगों के लिए उनकी पूजा विशेष रूप से लाभकारी होती है।

6. विशेष मनोकामना पूर्ण

चिंतामण गणेश की पूजा और दर्शन से भक्तों की विशेष इच्छाएं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

7. कर्मों का शुद्धिकरण

उनके दर्शन से न केवल जीवन के पापों का निवारण होता है, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है।

8. वैवाहिक जीवन में सुख

भगवान गणेश की कृपा से वैवाहिक जीवन में आने वाले विवाद और परेशानियां समाप्त होती हैं।

9. आध्यात्मिक उन्नति

गणेश जी के दर्शन से आत्मिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। भक्तों को जीवन में सत्य और धर्म का मार्ग प्राप्त होता है।

चिंतामण गणेश



नोट: चिंतामण गणेश के दर्शन करने के साथ-साथ सच्चे मन से प्रार्थना करना और दान-पुण्य करना लाभ को कई गुना बढ़ा देता है।

यदि आप उज्जैन में चिंतामण गणेश मंदिर के दर्शन की योजना बना रहे हैं, तो मार्गदर्शन या अन्य सेवाओं की आवश्यकता हो तो बताएं।

और पढ़ें:

भगवान कृष्ण ने शिक्षा श्री संदीपनि आश्रम पर ग्रहण की थी?

भगवान श्री कृष्ण ने अपनी शिक्षा उज्जैन में श्री संदीपनि आश्रम में ग्रहण की थी उनके साथ उनके बड़े भाई बलराम जी और उनके परम मित्र सुदामा जी ने भी गुरु सांदीपनि से ही शिक्षा ग्रहण की थी। संदीपनी महाकालेश्वर के एक अनन्य भक्त थे। उनकी महाकाल भक्ति और नित्य दर्शन के चलते ही उन्होंने अपना आश्रम काशी से उज्जैन स्थानांतरित किया था।

कंस वध के पश्चात वसुदेव जी ने भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा के लिए उज्जैन का चयन किया था। भगवान श्री कृष्ण ने सांदीपनि आश्रम में 64 दिनों में ही वेद शास्त्र कला विद्या युद्ध नीति और गीता का ज्ञान हासिल किया था। उन्होंने 18 दिनों में 18 पुराण 4 दिनों में चार वेद 6 दिनों में 6 शास्त्र 16 दिनों में 16 कलाएं 20 दिनों में गीता का ज्ञान प्राप्त किया था

सांदीपनि आश्रम के पास एक पत्थर पर 1 से 100 तक गिनती लिखिए माना जाता है यह गिनती पूर्व संदीपनी द्वारा लिखी गई थी। सांदीपनि आश्रम में गोमती कुंड भी स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि ऋषि सांदीपनि स्नान करने के लिए अपनी योग विद्या से रोज गोमती नदी के तट पर जाते थे, इसमें काफी समय व्यतीत होता था। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने गोमती नदी का हवन करके उन्हें उसे कुंड में अवतरित किया है।

आश्रम में 6000 साल पुराना शिव मंदिर भी है जिससे गुरु सांदीपनि ने अपने तपोवल से एक बिलपत्र से उत्पन्न किया था। पूरे विश्व में शिवलिंग के सामने नंदी जी बैठे हुए हैं परंतु इस प्राचीन मंदिर के बाहर नंदी जी खड़े हुए हैं। यह मंदिर खड़े नंदी जी के मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है।

श्री संदीपनि आश्रम

श्री संदीपनि आश्रम
श्री संदीपनि आश्रम पर भगवान कृष्ण, सुदामा,और बलराम तीनों के दर्शन एक साथ होते है।

यहां पर भगवान कृष्ण, सुदामा,और बलराम तीनों के दर्शन एक साथ होते है।

और पढ़ें:

भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता

ऋषि संदीपनी एक प्रखर विद्वान थे जो काशी में रहा करते थे। काशी में उनकी गिनती वेद के ज्ञाता, प्रकांड विद्वान और प्रमुख गुरुओं में होती थीं। उनका आश्रम शास्त्र, शस्त्र, कर्म और सांसारिक शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था। गुरु सांदीपनि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और महाकाल को इष्ट के रूप में पूजते थे।

भगवान महाकाल से निकटता और नित्य दर्शन के चलते उन्होंने अपना आश्रम काशी से उज्जैन स्थानांतरित किया था। उनके आश्रम के कारण द्वापर युग में उज्जैन शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बना। कंस वध के पश्चात जब वासुदेव जी ने भगवान कृष्ण और बलराम के शिक्षस्थली के रूप में उज्जैन का चयन किया था और उन्हें ऋषि संदीपनी के आश्रम में अध्ययन करने के लिए भेजा।

ऋषि संदीपनी के आश्रम में भगवान श्री कृष्णा और उनके भाई बलराम के अलावा सुदामा नमक एक अन्य छात्र भी था। सुदामा एक निर्धन ब्राह्मण पुत्र था वह भी अपने अध्ययन हेतु सांदीपनि आश्रम में ही रहता था। वहीं पर भगवान श्री कृष्ण की मित्रता सुदामा से हो गई थी और भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता हमें उदाहरण के तौर पर लेना चाहिए। उनका एक दूसरे के प्रति समर्पण त्याग और निस्वार्थ प्रेम अतुलनीय था।आज तक मित्रता की उच्चतम परिभाषा को परिभाषित करती है।

भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता

भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता

भगवान राजकुल के जन्मे थे और सुदामा एक दरिद्र ब्राह्मण के घर। एक निर्धन और एक धनवान की मित्रता का सबसे बड़ा उदाहरण भगवान कृष्ण की सुदामा से मित्रता है। आज के युग में जहां धन लालच और स्वार्थ ही सबसे बड़े कर्म बने हुए हैं भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता हमें उदाहरण के तौर पर लेना चाहिए। उनका एक दूसरे के प्रति समर्पण त्याग और निस्वार्थ प्रेम अतुलनीय था।

और पढ़ें:

महाकाल की शयन आरती कब होती है?

विश्व प्रसिद्ध श्री महाकाल मंदिर उज्जैन में स्थित है। यह 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है और विश्व का एकमात्र दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग है जिसकी भस्म आरती होती है। प्रतिदिन प्रातः काल 4:00 बजे भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, यह एक अनूठी प्रक्रिया है और इसके साक्षी सारे श्रद्धालु बनना चाहते हैं। श्री महाकाल की भस्म आरती के लिए पास पहले से बुकिंग करने पर ही उपलब्ध है बिना पास के महाकाल मंदिर में भस्म आरती के समय प्रवेश वर्जित है।

शयन आरती

श्री महाकालेश्वर की दिन में पांच आरती की जाती है उसमें शयन आरती अंतिम होती है। यह आरती गर्मियों में 10:30 बजे और दीपावली के बाद सर्दियों में रात 10:00 बजे होती है। इस आरती के पश्चात भगवान श्री महाकाल के दर्शन पट बंद हो जाते हैं और फिर सुबह 4:00 बजे भस्म आरती के पहले खुलते है।

शयन आरती

भगवान महाकालेश्वर की शयन आरती का अनुभव बहुत ही रोमांचकारी होता है। यह आरती ढोल धमाकों के साथ की जाती है जिसमें नित्य दर्शनार्थी कोरस में आरती और भजन गाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर देते हैं। यह एक ना भूल सकते वाला और अद्भुत अनुभव है। भगवान श्री महाकाल के प्रत्येक भक्त को जीवन में एक बार यह आरती जरूर देखना चाहिए। जय श्री महाकाल।।

और पढ़ें:

चौबीस खंभा माता मंदिर उज्जैन में कहां पर है?

चौबीस खंभा माता मंदिर गोपाल मंदिर से श्री महाकालेश्वर मंदिर जाने के मार्ग पर गुदरी चौराहे के निकट स्थित है। यह एक बड़े दरवाजे नुमा आकृति है जो किसी नगर के प्रवेश द्वार सा प्रतीत होता है इस दरवाजे के दोनों तरफ महामाया और महानाया माता का मंदिर है।

यह दरवाजा दसवीं शताब्दी में बनाया गया था और अपनी बनावट से परमार कालीन होना पाया गया है। विशाल दरवाजे के पीछे चौबीस खंभे बने हुए जो इस आकृति को मजबूत बनाते हैं इन्हीं चौबीस खंबे और दरवाजे के दोनों तरफ बने माता मंदिर की वजह से चौबीस खंबा माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। निम्नलिखित श्लोक से भी यह साक्ष्य मिलता है कि यह नगर द्वारा होगा

सहस्र पद विस्तीर्ण महाकाल वनं शुभम।
द्वार माहघर्रत्नार्द्य खचितं सौभ्यदिग्भवम्।।


इस श्लोक से विदित होता है कि एक हजार पैर विस्तार वाला महाकाल-वन है जिसका द्वार बेशकीमती रत्नों से जड़ित रत्नों से जड़ित उत्तर दिशा को है। इसके अनुसार उत्तर दिशा की ओर यही प्रवेश-द्वार है।

चौबीस खंभा माता मंदिर

चौबीस खंभा माता मंदिर

प्राचीन समय में इन मंदिरों में पशु बलि की जाती थी इसके साक्ष्य मिले परंतु इन कुरीतियों को बाद में बंद कर दिया गया। नवरात्र की अष्टमी को जो नगर पूजा की जाती है उसकी शुरुआत उज्जैन के कलेक्टर चौबीस खंभा माता मंदिर से करते हैं। उस दिन यहां मदिरा और गेहूं चने से बनी गई घुघरी का भोग चढ़ाया जाता है क्योंकि इसे तामसी भोजन माना गया है।

और पढ़ें:

राम घाट

श्री रामघाट उज्जैन के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध घाटों में से एक है। यह पुण्य सलिला मां शिप्रा के तट पर स्थित है। यह घाट कुंभ मेले के चार प्रमुख स्थानों में से एक है। कुंभ मेले में लाखों श्रद्धालु यहीं डुबकी लगाते है। उज्जैन में मनाए जाने वाले सभी स्नान पर्वों पर यहा डुबकी लगाने का विशेष महत्व है।

राम घाट

श्री राम घाट उज्जैन के क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित वो घाट है जहां पर भगवान श्री राम ने अपने पिता दशरथ के मृत्यु के पश्चात उनकी आत्मा को शांति के लिए उनके निमित्त पिंड दान, श्राद्ध और तर्पण उज्जैन के इसी घाट पर किया था तब से इस घाट का नाम राम घाट पड़ गया ।

मां क्षिप्रा को मध्य प्रदेश की गंगा के नाम से भी जाना जाता है वेदों में क्षिप्रा का अत्याधिक महत्व बताया गया। मां क्षिप्रा के पावन जल में स्नान कर भक्त लोग अपने जीवन को धन्य बनाते हैं और पापो से मुक्त हो जाते हैं।

राम घाट पर आकर श्रद्धालु अपनों की मृत्यु उपरांत अस्थि विसर्जन के लिए और पिंड दान के लिए भी आते हैं।

यहीं पर प्राचीन यमराज, चित्रकूट मंदिर बना हुआ है। अगर आपको पितृ देवताओं का तर्पण और मृत प्राणी की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान करना हो तो आपको उज्जैन के रामघाट मंदिर पर आकर उनके लिए रामघाट पर पिंड दिन जरूर करना चाहिए।

राम घाट
राम घाट

यहा़ पर विप्र, पंडित चावल के आटे का पिंड दान पितरों के निमित्त किया जाता है जिससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है।

और पढ़ें:

बरगद के पेड़ का महत्व

सनातन में बरगद के पेड़ का महत्व

सनातन के अनुसार बरगद के पेड़ का महत्व बहुत बड़ा है। ऐसा मन जाता है के बरगद के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास होता है। वेदों के अनुसार बरगद के पेड़ की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं एवं लताओं में शिव का निवास होता है। बरगद के पेड़ के नीचे घी का दीपक जलाने से त्रिदेव प्रसन्न हो जाते हैं।

बरगद के पेड़ को अक्षय वृक्ष भी कहा जाता है क्योंकि यह बहुत लंबे समय या वर्षो तक जीवित रहता है और वातावरण में शुद्ध प्राणवायु छोड़ता रहता है।

सनातन धर्म हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है और सनातन धर्म में हम हर जगह भगवान का वास देखते हैं। वृक्षों में भी भगवान का वास मानते हुए हम उनकी पूजा करते हैं और नित्य जीवन में भी हमने वृक्षों को और प्रकृति को सम्मिलित किया हुआ है। पशु पक्षी के साथ-साथ संसार में पाए जाने वाले हर कण में हम भगवान को खोजते हैं और उन्हें भगवान का रूप मानते हुए किसी न किसी रूप में पूजते हैं।

बरगद के पेड़ का महत्व

कई व्रत और अनुष्ठान बरगद के वृक्ष के बिना अधूरा है जैसे वट सावित्री अमावस्या। तुम्हारे पुराने ग्रंथ और साहित्य भी वट वृक्ष को मोक्ष दायक मानते हुए इसके नीचे तप करने की महत्वता को दर्शाता है। भगवान बुद्ध को भी इसी तरह एक वटवृक्ष के नीचे मोक्ष या ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। कई ऋषि मुनि और साधक वट वृक्ष के नीचे तप करके ज्ञानी बनें।

जब मकान का और सुविधाओं का अभाव हुआ करता था तब भी जीवन में हमने प्रकृति को सम्मिलित और समाहित किया हुआ था। उदाहरण के तौर पर देखें हर मंदिर में एक बरगद का पेड़ जरूर होता है और उसकी छाया में हम कुछ देर बैठकर मन को शांत करते हैं। इसी प्रकार हर विद्यालय, आश्रम, धर्मशाला, पार्क, मोहल्ला और रास्तों पर हमें वट वृक्ष मिलते हैं जो सदियों पुराने है। यह वृक्ष हमें बताते हैं की इन्हीं की छाया का हमने कई तरह से उपयोग किया है।

और पढ़ें:

तुलसी की पूजा क्यों की जाती है?

सनातन धर्म में हम प्रकृति के हर घटक को देवतुल्य मानते हुए पूजते है। प्रकृति से हमारा प्रेम यूं ही नहीं है, हमने पशु, पक्षी, वृक्ष और पत्थरों को भी हमने देवता माना है। प्रकृति से मिले हर एक घटक को हमने अपने जीवन में एक उच्च स्थान दिया है। वैसे तो हम कई वृक्षों को पूजते हैं परंतु तुलसी का स्थान सब उच्चतम है।

तुलसी जिसे हम वृंदा के नाम से भी जाना जाता है भगवान श्री कृष्ण को प्राणतुल्य प्रिय है। तुलसी पत्र के बिना भगवान के सारे भोग अधूरे है। मंदिरों और घरों में विराजित श्री हरि विष्णु के सभी अवतारों और उनके विद्रोह को बिना तुलसी के भोग वर्जित है जो भगवान को भी अस्वीकार्य है।

तुलसी हर आंगन की शोभा है हर आंगन, हर घर, हर परिवार तुलसी के बिना अधूरा है यह हमारे जीवन में एक अनिवार्य वस्तु की तरह घुली  मिली है। हमारे साहित्य और बोलचाल में भी तुलसी का बड़ा महत्व है “मैं तुलसी तेरे आंगन की” एक मुहावरे के रूप में प्रसिद्ध है और इसका उपयोग साहित्य, सिनेमा और हमारी दिनचर्या में कई बार हुआ है।

जब हनुमान जी माता सीता का पता लगाने के लिए लंका गए थे तब भी रावण के छोटे भाई विभीषण के आंगन में तुलसी होने का विवरण है। विभीषण एक एक सच्चरित्र ब्राह्मण थे और भगवान के भक्त भी थे। सनातन में हमने तुलसी को हमारे उत्सव और त्यौहार में भी सम्मिलित किया हुआ है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में होने वाला तुलसी विवाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

वैज्ञानिक कारण – वास्तव में तुलसी अत्यधिक प्राणवायु या ऑक्सिजन देने वाला और औषधीय महत्व रखने वाला पौधा है। इसका उपयोग सर्दी और जुखाम के इलाज़ के लिए किया जाता है। तुलसी की माला हर श्री कृष्ण भक्ति के गले की शोभा बनती है बिना तुलसी के राधा कृष्ण का नाम अधूरा है। तुलसी की माला जिसका उपयोग जप करने के लिए भी होता है इसी के साथ तुलसी की लकड़ी का उपयोग तिलक लगाने में भी किया जाता है। इन्हीं कर्म के चलते हिंदू धर्म में इसे आंगन और बगीचे में लगाया जाता है।

सनातन धर्म संस्कृति में तुलसी एक वस्तु या पौधे से बढ़कर बहुत कुछ है इन सब बातें को जानने के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहे। एक अलग ब्लॉक में हम तुलसी और श्री कृष्ण के संबंध में विस्तार से लिखेंगे। हमसे जुड़ने के लिए धन्यवाद

और पढ़ें:

उज्जैन में आठ या अष्ट भैरव कौन से है?

इस वर्ष 23 नवंबर शनिवार को भैरवाष्टमी है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अगहन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मध्यरात्रि में भैरव का जन्म हुआ था इसलिए इसे भैरव जयंती भी कहते है। महाकाल की नगरी में भैरव पूजा का विशेष मान्यता है।

स्कंद पुराण के अवंति खंड के अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव का उल्लेख मिलता है। भैरव अष्टमी के अवसर पर उज्जैन में अष्ट भैरव की यात्रा का विशेष महत्व माना गया है।  इस दिन अष्ट भैरव की यात्रा तथा दर्शन पूजन करने से मनवांछित फल मिलता है और समस्त प्रकार के भाई से मुक्ति मिलती है।

भैरव तंत्र का कथन है कि जो भय से मुक्ति दिलाए वह भैरव है।

क्या है भैरव का मूल स्थान :- श्मशान तथा उसके आसपास का एकांत जंगल ही भैरव का मूल स्थान है। संपूर्ण भारत में मात्र उज्जैन ही एक ऐसा स्थल है, जहां ओखलेश्वर तथा चक्रतीर्थ श्मशान हैं। अष्ट भैरव (अष्ट महाभैरव) इन्हीं स्थानों पर विराजमान है।

स्कंद पुराण में लिखे अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव निम्न स्थानों पर विराजमान है। जानिए कहां-कहां है उनका स्थान :-

1. भैरवगढ़ में श्री काल भैरव – विश्व प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर जिन्हें भगवान महाकाल के सेनापति के रूप में भी जाना जाता है। यहां भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है।

2. चक्र तीर्थ शमशान में स्थित बम बटुक भैरव – उज्जैन के प्रमुख शमशान को तीर्थ की संज्ञा दी गई है माना जाता है यहां पर दाह संस्कार के बाद जीवन मृत्यु चक्र से मुक्ति मिल जाती है इसीलिए इस चक्र तीर्थ भी कहते हैं। बम बटुक भैरव इसी शमशान में विराजित देवता है।

3. रामघाट के समीप स्थित आनंद भैरव – श्री आनंद भैरव मंदिर शिप्रा नदी की छोटी रपट (पुल) के बाईं ओर प्रसिद्ध रामघाट मार्ग पर ही स्थित है। यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बाहर से तो अति प्राचीन नहीं दिखता है, किन्तु देव-प्रतिमा के दर्शन करने तथा प्रतिमा के दाएं और बाएं विद्यमान मूर्तियों एवं स्तंभों की अंशत: दृष्टव्य आकृतियों के आधार पर नि:संदिग्ध रूप से अति प्राचीन लगता है।

4. दंड पाणी भैरव – यह मंदिर शिप्रा तट के पास स्थित कालिदास उद्यान के मध्य भाग में स्थित है। करीब 450 वर्गफीट के चारों ओर 3 फीट ऊंची दीवारों तथा 12 फीट ऊंची छत तक चौतरफा लोहे के सरियों से अभिरक्षित कक्ष के मध्य स्थित केवल 20 वर्गफीट के गर्भगृह में भैरवजी की सिंदूरचर्चित मुण्डाकृति मूर्ति समतल भूमि पर पिण्डवत विराजित है। यह मंदिर भी मां क्षिप्रा नदी के किनारे पर स्थित है।

5. ओखलेश्वर शमशान पर स्थित विक्रांत भैरव – कालभैरव के निकट ओखलेश्वर शमशान पर स्थित विक्रांत भैरव  क्षिप्रा नदी के किनारे विराजमान हैं। ओखलेश्वर शमशान एक जागृत शमशान माना जाता है और वहां विराजने वाले श्री विक्रांत भैरव तंत्र के देवता के रूप में जाने जाते हैं। यहां प्रतिदिन तांत्रिक क्रियाएं होती रहती है।

6. काला गौरा – मुख्य मार्ग ढाबा रोड़ पर गेबी हनुमान मंदिर की गली के सामने से आपको भैरवजी के दो मंदिर दिखाई देंगे। इनमें दाईं ओर स्थित मंदिर में श्री काला भैरव की मूर्ति सड़क मार्ग से करीब 2 फीट ऊंचे गर्भगृह में टाइल्स जड़े फर्श पर स्थापित है। गर्भगृह में यह मूर्त्ति बाई ओर हटकर स्थापित है जबकि दाई ओर स्थान खाली पड़ा है। बाई ओर गोरा भैरव की प्रतिमा है। छोटा-सा यह मंदिर भी सड़क से करीब ड़ेढ़ फीट ऊंचा है। यह मूर्ति भी जागृत है।

7. चक्रपाणि भैरव, श्री बटुक भैरव – स्कन्द महापुराण में महादेव ने देवी पार्वती को अवन्ती क्षेत्र के अष्ट भैरवों के जो नाम बताए, उनमें पांचवें क्रम पर श्री बटुक भैरव का नाम बताया गया है। मंदिर शिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन शहर के प्रमुख श्मशान चक्रतीर्थ के ठीक पहले बाईं ओर ऊपर ही बना है जिसके द्वार से होकर दाईं ओर जाने पर कुछ सीढ़ियां उतरकर पूर्वाभिमुखी बटुक भैरव के मुण्ड स्वरूप में बाल छवि के दर्शन होते हैं।

8. श्री महाभैरव आताल-पाताल भैरव – स्कन्द महापुराण के अवन्ती-माहात्म्य-खण्ड में यह मंदिर सिंहपुरी में बताया है। इनका यह नाम इस माने में अर्थसिद्ध है क्योंकि इसकी मूल आकृति का आधा निचला भाग भूमिगत तथा ऊपरी आधा भाग ऊपर था। देवमूर्ति पिण्डात्मक एवं सिंदूरचर्चित है तथा महाभैरवजी का केवल मुण्ड ही दिखाई देता है। यह मंदिर अति प्राचीन होने से भगवान महाभैरव द्वारा भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण की जाती हैं।

अष्ट भैरव-साधना से पीड़ामुक्ति

शनि, राहु, केतु तथा मंगल ग्रह से जो जातक पीड़ित हैं, उन्हें भैरव की साधना अवश्य ही करनी चाहिए। अगर जन्मपत्रिका में मारकेश ग्रहों के रूप में यदि उक्त चारों ग्रहों में से किसी एक का भी प्रभाव दिखाई देता हो तो भैरव जी का पंचोपचार पूजन जरूर करवाना चाहिए। भैरव के जाप, पठनात्मक एवं हवनात्मक अनुष्ठान मृत्युतुल्य कष्ट को समाप्त कर देते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व – सनातन धर्म में कार्तिक माह का बहुत महत्व है। कार्तिक माह में किए गए दान और स्नान को मोक्ष कारक माना जाता है। कार्तिक माह भगवान श्री हरि विष्णु को बहुत प्रिय है और इस माह में दीपावली जैसे पांच दिवसीय त्योहार के होने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। इस पूरे माह में सुबह उठकर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना और पूरे माह दान करना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।

वैसे तो कार्तिक माह में कई व्रत और त्योहार आते हैं और सबका अपना अलग-अलग महत्व है परंतु कार्तिक पूर्णिमा जो इस माह में पढ़ने वाला अंतिम दिन होता है उसका भी अपना अलग ही महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा में तीर्थ करना और नदियों में डुबकी लगाने का भी विशेष महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली भी कहते हैं इसी दिन सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक साहब का जन्म भी हुआ था उसका भी अपना अलग महत्व है।

मान्यता है की इससे दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से सारे पापों का नाश हो जाता है और व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूरे देश में सारी जल सरोवर एवं नदियों में लाखों श्रद्धालु स्नान करते हैं। कार्तिक माह में किए गए जप, तप, दान और स्नान का विशेष महत्व है। इसी दिन भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। विष्णु पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान श्री हरि विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। पूरे कार्तिक माह सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने और भगवान श्री विष्णु की पूजा करने का विधान है।

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान और दान का भी अपना अलग ही महत्व है, इस दिन स्नान कर कर दान किया जाता है। इस दिन दीपदान करना शुभ माना गया है और इससे परिवार में सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है और सारे कष्ट दूर होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान दान के साथ गोदान करने से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

उज्जैन दर्शन के बारे में और जाने
श्री महाकाल भस्मारती के संबंध में और पढ़े