महाकाल की शयन आरती कब होती है?

विश्व प्रसिद्ध श्री महाकाल मंदिर उज्जैन में स्थित है। यह 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है और विश्व का एकमात्र दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग है जिसकी भस्म आरती होती है। प्रतिदिन प्रातः काल 4:00 बजे भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, यह एक अनूठी प्रक्रिया है और इसके साक्षी सारे श्रद्धालु बनना चाहते हैं। श्री महाकाल की भस्म आरती के लिए पास पहले से बुकिंग करने पर ही उपलब्ध है बिना पास के महाकाल मंदिर में भस्म आरती के समय प्रवेश वर्जित है।

शयन आरती

श्री महाकालेश्वर की दिन में पांच आरती की जाती है उसमें शयन आरती अंतिम होती है। यह आरती गर्मियों में 10:30 बजे और दीपावली के बाद सर्दियों में रात 10:00 बजे होती है। इस आरती के पश्चात भगवान श्री महाकाल के दर्शन पट बंद हो जाते हैं और फिर सुबह 4:00 बजे भस्म आरती के पहले खुलते है।

शयन आरती

भगवान महाकालेश्वर की शयन आरती का अनुभव बहुत ही रोमांचकारी होता है। यह आरती ढोल धमाकों के साथ की जाती है जिसमें नित्य दर्शनार्थी कोरस में आरती और भजन गाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर देते हैं। यह एक ना भूल सकते वाला और अद्भुत अनुभव है। भगवान श्री महाकाल के प्रत्येक भक्त को जीवन में एक बार यह आरती जरूर देखना चाहिए। जय श्री महाकाल।।

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चौबीस खंभा माता मंदिर उज्जैन में कहां पर है?

चौबीस खंभा माता मंदिर गोपाल मंदिर से श्री महाकालेश्वर मंदिर जाने के मार्ग पर गुदरी चौराहे के निकट स्थित है। यह एक बड़े दरवाजे नुमा आकृति है जो किसी नगर के प्रवेश द्वार सा प्रतीत होता है इस दरवाजे के दोनों तरफ महामाया और महानाया माता का मंदिर है।

यह दरवाजा दसवीं शताब्दी में बनाया गया था और अपनी बनावट से परमार कालीन होना पाया गया है। विशाल दरवाजे के पीछे चौबीस खंभे बने हुए जो इस आकृति को मजबूत बनाते हैं इन्हीं चौबीस खंबे और दरवाजे के दोनों तरफ बने माता मंदिर की वजह से चौबीस खंबा माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। निम्नलिखित श्लोक से भी यह साक्ष्य मिलता है कि यह नगर द्वारा होगा

सहस्र पद विस्तीर्ण महाकाल वनं शुभम।
द्वार माहघर्रत्नार्द्य खचितं सौभ्यदिग्भवम्।।


इस श्लोक से विदित होता है कि एक हजार पैर विस्तार वाला महाकाल-वन है जिसका द्वार बेशकीमती रत्नों से जड़ित रत्नों से जड़ित उत्तर दिशा को है। इसके अनुसार उत्तर दिशा की ओर यही प्रवेश-द्वार है।

चौबीस खंभा माता मंदिर

चौबीस खंभा माता मंदिर

प्राचीन समय में इन मंदिरों में पशु बलि की जाती थी इसके साक्ष्य मिले परंतु इन कुरीतियों को बाद में बंद कर दिया गया। नवरात्र की अष्टमी को जो नगर पूजा की जाती है उसकी शुरुआत उज्जैन के कलेक्टर चौबीस खंभा माता मंदिर से करते हैं। उस दिन यहां मदिरा और गेहूं चने से बनी गई घुघरी का भोग चढ़ाया जाता है क्योंकि इसे तामसी भोजन माना गया है।

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राम घाट

श्री रामघाट उज्जैन के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध घाटों में से एक है। यह पुण्य सलिला मां शिप्रा के तट पर स्थित है। यह घाट कुंभ मेले के चार प्रमुख स्थानों में से एक है। कुंभ मेले में लाखों श्रद्धालु यहीं डुबकी लगाते है। उज्जैन में मनाए जाने वाले सभी स्नान पर्वों पर यहा डुबकी लगाने का विशेष महत्व है।

राम घाट

श्री राम घाट उज्जैन के क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित वो घाट है जहां पर भगवान श्री राम ने अपने पिता दशरथ के मृत्यु के पश्चात उनकी आत्मा को शांति के लिए उनके निमित्त पिंड दान, श्राद्ध और तर्पण उज्जैन के इसी घाट पर किया था तब से इस घाट का नाम राम घाट पड़ गया ।

मां क्षिप्रा को मध्य प्रदेश की गंगा के नाम से भी जाना जाता है वेदों में क्षिप्रा का अत्याधिक महत्व बताया गया। मां क्षिप्रा के पावन जल में स्नान कर भक्त लोग अपने जीवन को धन्य बनाते हैं और पापो से मुक्त हो जाते हैं।

राम घाट पर आकर श्रद्धालु अपनों की मृत्यु उपरांत अस्थि विसर्जन के लिए और पिंड दान के लिए भी आते हैं।

यहीं पर प्राचीन यमराज, चित्रकूट मंदिर बना हुआ है। अगर आपको पितृ देवताओं का तर्पण और मृत प्राणी की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान करना हो तो आपको उज्जैन के रामघाट मंदिर पर आकर उनके लिए रामघाट पर पिंड दिन जरूर करना चाहिए।

राम घाट
राम घाट

यहा़ पर विप्र, पंडित चावल के आटे का पिंड दान पितरों के निमित्त किया जाता है जिससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है।

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भगवान महाकाल की भस्मारती में प्रयोग की जाने वाली भस्म कहा से लाई जाती है?

महाकालेश्वर मंदिर में प्रातः काल 4:00 बजे होने वाली आरती को भस्म आरती कहा जाता है। इस आरती में दिगंबर स्वरूप भगवान श्री महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। यह आरती एक अद्वितीय अनुभव है जो विश्व में कहीं और देखा नहीं जाता है। भस्म आरती के बारे में कई सारी कहानियां और किंवदंतियां प्रचलित है।

जितने मुख उतनी बातें यह कहावत चरितार्थ होती है जब बात महाकालेश्वर के भस्म की आती है हर कोई अपना एक नया संस्करण प्रस्तुत करता है। भगवान श्री महाकाल को चढ़ने वाली भस्म कहां से लाई जाती है कुछ लोग कहते हैं के शमशान में जलने वाली चिताओं की भस्म है परंतु मंदिर के पुजारी कहते हैं यह गाय की गोबर से बनाए गए उपलों से तैयार की गई भस्म है जो सिर्फ महाकाल को अर्पित करने के लिए ही तैयार की जाती है।

महाकाल मंदिर मैं तीन तल है, भूतल पर स्थित श्री ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे धूनी का कमरा है, जहां अखंड धूनी जल रही है। उसे धुनी में बनने वाली भस्म को ही सूती कपड़े से छान कर भगवान श्री महाकालेश्वर को अर्पण करने के लिए भस्म तैयार की जाती है।

श्री महाकालेश्वर मंदिर महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा का निर्वहन करता है। इसी अखाड़े से संबंधित साधु गण इस भस्म को तैयार करते हैं और भगवान श्री महाकाल को अर्पित करते हैं। हमारे देश में आज भी कुछ मुख्य परंपरा अखाड़ों के द्वारा प्रबंधन की जाती है।

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बरगद के पेड़ का महत्व

सनातन में बरगद के पेड़ का महत्व

सनातन के अनुसार बरगद के पेड़ का महत्व बहुत बड़ा है। ऐसा मन जाता है के बरगद के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास होता है। वेदों के अनुसार बरगद के पेड़ की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं एवं लताओं में शिव का निवास होता है। बरगद के पेड़ के नीचे घी का दीपक जलाने से त्रिदेव प्रसन्न हो जाते हैं।

बरगद के पेड़ को अक्षय वृक्ष भी कहा जाता है क्योंकि यह बहुत लंबे समय या वर्षो तक जीवित रहता है और वातावरण में शुद्ध प्राणवायु छोड़ता रहता है।

सनातन धर्म हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है और सनातन धर्म में हम हर जगह भगवान का वास देखते हैं। वृक्षों में भी भगवान का वास मानते हुए हम उनकी पूजा करते हैं और नित्य जीवन में भी हमने वृक्षों को और प्रकृति को सम्मिलित किया हुआ है। पशु पक्षी के साथ-साथ संसार में पाए जाने वाले हर कण में हम भगवान को खोजते हैं और उन्हें भगवान का रूप मानते हुए किसी न किसी रूप में पूजते हैं।

बरगद के पेड़ का महत्व

कई व्रत और अनुष्ठान बरगद के वृक्ष के बिना अधूरा है जैसे वट सावित्री अमावस्या। तुम्हारे पुराने ग्रंथ और साहित्य भी वट वृक्ष को मोक्ष दायक मानते हुए इसके नीचे तप करने की महत्वता को दर्शाता है। भगवान बुद्ध को भी इसी तरह एक वटवृक्ष के नीचे मोक्ष या ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। कई ऋषि मुनि और साधक वट वृक्ष के नीचे तप करके ज्ञानी बनें।

जब मकान का और सुविधाओं का अभाव हुआ करता था तब भी जीवन में हमने प्रकृति को सम्मिलित और समाहित किया हुआ था। उदाहरण के तौर पर देखें हर मंदिर में एक बरगद का पेड़ जरूर होता है और उसकी छाया में हम कुछ देर बैठकर मन को शांत करते हैं। इसी प्रकार हर विद्यालय, आश्रम, धर्मशाला, पार्क, मोहल्ला और रास्तों पर हमें वट वृक्ष मिलते हैं जो सदियों पुराने है। यह वृक्ष हमें बताते हैं की इन्हीं की छाया का हमने कई तरह से उपयोग किया है।

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भृतहरि गुफ़ा उज्जैन में कहां स्थित है ?

उज्जैन में राजा भृतहरि गुफ़ा शिप्रा तट पर गढ़कालिका मंदिर के पास स्थित है। यह नाथ संप्रदाय का एक बड़ा केंद्र है यहां राजा भृतहरि और उनके भांजे श्री गोपीनाथ की गुफाएं है जहां उन्होंने तप किया था।

राजा भृतहरि सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई थे और उज्जैन में उन्हीं का शासन था परंतु एक ऐसी घटना घटी जिस के पश्चात उन्होंने वैराग्य ले लिया और उन्होंने अपना राजपाट सम्राट विक्रमादित्य को सौंप दिया।

राजा भृतहरि ने शिप्रा नदी के तट पर एक छोटी पहाड़ी पर 12 वर्षों तक कठोर तप किया। यह तप देखकर देवराज इंद्र मैं उनकी तपस्या भंग करने हेतु गुफा को धान का प्रयास किया जिसे तकलीफ राजा भृतहरि ने अपने एक हाथ से रोक दिया। उनके हाथ से बना निशान आज भी गुफा में स्थित है लोग उसे छूट भी हैं।

कालीकाजी के मंदिर जिसे गढ़कालिका मंदिर के नाम से जाना जाता है के पास में बनी हुई है।

राजा भृतहरि गुफ़ा
भृतहरि गुफ़ा

भृतहरि एक प्रकांड पंडित थे कहा जाता है की राजा भृतहरि को अमरता का वरदान है। अपनी पत्नी के गलत राह पर जाने के चलते उन्होंने अपना संपूर्ण साम्राज्य राजा विक्रमादित्य को सौप कर सन्यास ग्रहण कर लिया।

राजा भृतहरि ने जिस गुफ़ा में तपस्या की थी उसी गुफ़ा को भृतहरि गुफ़ा के नाम से जाना जाता है इस गुफा के अंदर से चार धाम का मार्ग धरती के अंदर -अंदर होकर जाता है किंतु इस समय यह मार्ग बंद है।

यहां कुल दो गुफाएं है साथ ही राजा भृतहरि की समाधि भी यहां पर बनी हुई है।

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तुलसी की पूजा क्यों की जाती है?

सनातन धर्म में हम प्रकृति के हर घटक को देवतुल्य मानते हुए पूजते है। प्रकृति से हमारा प्रेम यूं ही नहीं है, हमने पशु, पक्षी, वृक्ष और पत्थरों को भी हमने देवता माना है। प्रकृति से मिले हर एक घटक को हमने अपने जीवन में एक उच्च स्थान दिया है। वैसे तो हम कई वृक्षों को पूजते हैं परंतु तुलसी का स्थान सब उच्चतम है।

तुलसी जिसे हम वृंदा के नाम से भी जाना जाता है भगवान श्री कृष्ण को प्राणतुल्य प्रिय है। तुलसी पत्र के बिना भगवान के सारे भोग अधूरे है। मंदिरों और घरों में विराजित श्री हरि विष्णु के सभी अवतारों और उनके विद्रोह को बिना तुलसी के भोग वर्जित है जो भगवान को भी अस्वीकार्य है।

तुलसी हर आंगन की शोभा है हर आंगन, हर घर, हर परिवार तुलसी के बिना अधूरा है यह हमारे जीवन में एक अनिवार्य वस्तु की तरह घुली  मिली है। हमारे साहित्य और बोलचाल में भी तुलसी का बड़ा महत्व है “मैं तुलसी तेरे आंगन की” एक मुहावरे के रूप में प्रसिद्ध है और इसका उपयोग साहित्य, सिनेमा और हमारी दिनचर्या में कई बार हुआ है।

जब हनुमान जी माता सीता का पता लगाने के लिए लंका गए थे तब भी रावण के छोटे भाई विभीषण के आंगन में तुलसी होने का विवरण है। विभीषण एक एक सच्चरित्र ब्राह्मण थे और भगवान के भक्त भी थे। सनातन में हमने तुलसी को हमारे उत्सव और त्यौहार में भी सम्मिलित किया हुआ है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में होने वाला तुलसी विवाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

वैज्ञानिक कारण – वास्तव में तुलसी अत्यधिक प्राणवायु या ऑक्सिजन देने वाला और औषधीय महत्व रखने वाला पौधा है। इसका उपयोग सर्दी और जुखाम के इलाज़ के लिए किया जाता है। तुलसी की माला हर श्री कृष्ण भक्ति के गले की शोभा बनती है बिना तुलसी के राधा कृष्ण का नाम अधूरा है। तुलसी की माला जिसका उपयोग जप करने के लिए भी होता है इसी के साथ तुलसी की लकड़ी का उपयोग तिलक लगाने में भी किया जाता है। इन्हीं कर्म के चलते हिंदू धर्म में इसे आंगन और बगीचे में लगाया जाता है।

सनातन धर्म संस्कृति में तुलसी एक वस्तु या पौधे से बढ़कर बहुत कुछ है इन सब बातें को जानने के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहे। एक अलग ब्लॉक में हम तुलसी और श्री कृष्ण के संबंध में विस्तार से लिखेंगे। हमसे जुड़ने के लिए धन्यवाद

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उज्जैन में आठ या अष्ट भैरव कौन से है?

इस वर्ष 23 नवंबर शनिवार को भैरवाष्टमी है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अगहन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मध्यरात्रि में भैरव का जन्म हुआ था इसलिए इसे भैरव जयंती भी कहते है। महाकाल की नगरी में भैरव पूजा का विशेष मान्यता है।

स्कंद पुराण के अवंति खंड के अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव का उल्लेख मिलता है। भैरव अष्टमी के अवसर पर उज्जैन में अष्ट भैरव की यात्रा का विशेष महत्व माना गया है।  इस दिन अष्ट भैरव की यात्रा तथा दर्शन पूजन करने से मनवांछित फल मिलता है और समस्त प्रकार के भाई से मुक्ति मिलती है।

भैरव तंत्र का कथन है कि जो भय से मुक्ति दिलाए वह भैरव है।

क्या है भैरव का मूल स्थान :- श्मशान तथा उसके आसपास का एकांत जंगल ही भैरव का मूल स्थान है। संपूर्ण भारत में मात्र उज्जैन ही एक ऐसा स्थल है, जहां ओखलेश्वर तथा चक्रतीर्थ श्मशान हैं। अष्ट भैरव (अष्ट महाभैरव) इन्हीं स्थानों पर विराजमान है।

स्कंद पुराण में लिखे अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव निम्न स्थानों पर विराजमान है। जानिए कहां-कहां है उनका स्थान :-

1. भैरवगढ़ में श्री काल भैरव – विश्व प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर जिन्हें भगवान महाकाल के सेनापति के रूप में भी जाना जाता है। यहां भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है।

2. चक्र तीर्थ शमशान में स्थित बम बटुक भैरव – उज्जैन के प्रमुख शमशान को तीर्थ की संज्ञा दी गई है माना जाता है यहां पर दाह संस्कार के बाद जीवन मृत्यु चक्र से मुक्ति मिल जाती है इसीलिए इस चक्र तीर्थ भी कहते हैं। बम बटुक भैरव इसी शमशान में विराजित देवता है।

3. रामघाट के समीप स्थित आनंद भैरव – श्री आनंद भैरव मंदिर शिप्रा नदी की छोटी रपट (पुल) के बाईं ओर प्रसिद्ध रामघाट मार्ग पर ही स्थित है। यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बाहर से तो अति प्राचीन नहीं दिखता है, किन्तु देव-प्रतिमा के दर्शन करने तथा प्रतिमा के दाएं और बाएं विद्यमान मूर्तियों एवं स्तंभों की अंशत: दृष्टव्य आकृतियों के आधार पर नि:संदिग्ध रूप से अति प्राचीन लगता है।

4. दंड पाणी भैरव – यह मंदिर शिप्रा तट के पास स्थित कालिदास उद्यान के मध्य भाग में स्थित है। करीब 450 वर्गफीट के चारों ओर 3 फीट ऊंची दीवारों तथा 12 फीट ऊंची छत तक चौतरफा लोहे के सरियों से अभिरक्षित कक्ष के मध्य स्थित केवल 20 वर्गफीट के गर्भगृह में भैरवजी की सिंदूरचर्चित मुण्डाकृति मूर्ति समतल भूमि पर पिण्डवत विराजित है। यह मंदिर भी मां क्षिप्रा नदी के किनारे पर स्थित है।

5. ओखलेश्वर शमशान पर स्थित विक्रांत भैरव – कालभैरव के निकट ओखलेश्वर शमशान पर स्थित विक्रांत भैरव  क्षिप्रा नदी के किनारे विराजमान हैं। ओखलेश्वर शमशान एक जागृत शमशान माना जाता है और वहां विराजने वाले श्री विक्रांत भैरव तंत्र के देवता के रूप में जाने जाते हैं। यहां प्रतिदिन तांत्रिक क्रियाएं होती रहती है।

6. काला गौरा – मुख्य मार्ग ढाबा रोड़ पर गेबी हनुमान मंदिर की गली के सामने से आपको भैरवजी के दो मंदिर दिखाई देंगे। इनमें दाईं ओर स्थित मंदिर में श्री काला भैरव की मूर्ति सड़क मार्ग से करीब 2 फीट ऊंचे गर्भगृह में टाइल्स जड़े फर्श पर स्थापित है। गर्भगृह में यह मूर्त्ति बाई ओर हटकर स्थापित है जबकि दाई ओर स्थान खाली पड़ा है। बाई ओर गोरा भैरव की प्रतिमा है। छोटा-सा यह मंदिर भी सड़क से करीब ड़ेढ़ फीट ऊंचा है। यह मूर्ति भी जागृत है।

7. चक्रपाणि भैरव, श्री बटुक भैरव – स्कन्द महापुराण में महादेव ने देवी पार्वती को अवन्ती क्षेत्र के अष्ट भैरवों के जो नाम बताए, उनमें पांचवें क्रम पर श्री बटुक भैरव का नाम बताया गया है। मंदिर शिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन शहर के प्रमुख श्मशान चक्रतीर्थ के ठीक पहले बाईं ओर ऊपर ही बना है जिसके द्वार से होकर दाईं ओर जाने पर कुछ सीढ़ियां उतरकर पूर्वाभिमुखी बटुक भैरव के मुण्ड स्वरूप में बाल छवि के दर्शन होते हैं।

8. श्री महाभैरव आताल-पाताल भैरव – स्कन्द महापुराण के अवन्ती-माहात्म्य-खण्ड में यह मंदिर सिंहपुरी में बताया है। इनका यह नाम इस माने में अर्थसिद्ध है क्योंकि इसकी मूल आकृति का आधा निचला भाग भूमिगत तथा ऊपरी आधा भाग ऊपर था। देवमूर्ति पिण्डात्मक एवं सिंदूरचर्चित है तथा महाभैरवजी का केवल मुण्ड ही दिखाई देता है। यह मंदिर अति प्राचीन होने से भगवान महाभैरव द्वारा भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण की जाती हैं।

अष्ट भैरव-साधना से पीड़ामुक्ति

शनि, राहु, केतु तथा मंगल ग्रह से जो जातक पीड़ित हैं, उन्हें भैरव की साधना अवश्य ही करनी चाहिए। अगर जन्मपत्रिका में मारकेश ग्रहों के रूप में यदि उक्त चारों ग्रहों में से किसी एक का भी प्रभाव दिखाई देता हो तो भैरव जी का पंचोपचार पूजन जरूर करवाना चाहिए। भैरव के जाप, पठनात्मक एवं हवनात्मक अनुष्ठान मृत्युतुल्य कष्ट को समाप्त कर देते हैं।

उज्जैन में अध्यात्म और साहित्य

सनातन धर्म में उज्जैन का स्थान उच्च कोटि का है। यहां ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ, महा शक्तिपीठ, अष्ट भैरव, 64 योगिनी, 84 महादेव, सप्त सागर और भी कई प्रसिद्ध एवं प्राचीन मंदिर स्थित है। उसके अलावा उज्जैन में कुंभ मेला लगता है जो की उज्जैन के उज्जैन के महत्व को और भी बढ़ा देते हैं। उज्जैन में बहने वाली मां शिप्रा का भी सनातन धर्म में एक विशेष महत्व है ऐसा माना जाता है। माता शिप्रा भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है।

अध्यात्म और साहित्य में भी उज्जैन का उल्लेख कई जगह मिलता है।

महाकवि कालिदास की सारी रचना उज्जैन को लेकर ही है। भगवान वेदव्यास रचित महाभारत में भी अवंतिका के रूप में उज्जैन का और उज्जैन के राजा का वर्णन है। भगवान श्री कृष्ण की विद्यास्थली उज्जैन में ही स्थित श्री सांदीपनि आश्रम है। उज्जैन से 15 किलोमीटर दूर नारायण गांव में श्री कृष्णा बलराम सुदामा का मंदिर उसे पल का साक्षी है जब भगवान श्री कृष्णा अपने भाई बलराम और सुदामा के साथ जंगल में लड़कियां तोड़ने गए थे।

ज्योतिष एवं ज्यामिति में भी उज्जैन का योगदान काम नहीं है। विक्रमादित्य के समय क्षपणक और वराहमिहिर ज्योतिष और ज्यामिति के प्रसिद्ध विद्वान थे जिनकी रचना आज भी जनमानस के पथ को प्रदर्शित करती है।

प्राचीन समय से ही उज्जैन काल गणना का एक प्रमुख केंद्र है। कर्क रेखा उज्जैन से होकर ही निकलती है इसका भी काल गणना में बड़ा महत्व है। उज्जैन के कई मंदिर काल गणना के बड़े केंद्र हैं महाकालेश्वर मंदिर में विराजित भगवान श्री शिव को भी महाकाल के रूप में ही जाना जाता है। महाकाल में हम भगवान को समय के रूप में ही पूजते है। मंगलनाथ मंदिर को मंगल ग्रह का जन्म स्थान माना जाता है साथ ही अगर आपकी कुंडली में मंगल दोष हो तो मंगलनाथ मंदिर में उसकी पूजा की जाती है जिसका भी ज्योतिष से ही संबंध है।

अध्यात्म और साहित्य

जयपुर के राजा जयसिंह ने उज्जैन में कालगणना के लिए ही जंतर मंतर की स्थापना करवाई थी और उज्जैन के जंतर मंतर के यंत्रों की क्षमता किसी से छुपी नहीं है। यह सारे यंत्र सटीक जानकारी देते हैं।

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उज्जैन में गोपाल मंदिर कहा पर स्थित है साथ ही इसकी क्या विशेषता है जो विश्व में अन्य किसी गोपाल मंदिर में देखने को नहीं मिलती?

गोपाल मंदिर

उज्जैन, सनातन धर्म की सात पवित्र नगरी जिन्हें हम सप्तपूरियों के नाम से भी जानते हैं में शामिल है। उज्जैन एक प्रसिद्ध तीर्थ है जिसका महत्व हर युग में लिखित है। सतयुग में राजा हरिश्चंद्र के जीवन वृतांत में उज्जैन का उल्लेख है वहीं त्रेता युग में भगवान राम भी उज्जैन और हुए है। द्वापर युग में तो उज्जैन भगवान श्री कृष्ण की विद्यास्थली के रूप के जाना जाता है और कलियुग में राजा विक्रमादित्य और महाकवि कालिदास की रचना भी उज्जैन के आस पास ही है।

प्राचीनता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भी उज्जैन से बहुत गहरा संबंध है। सम्राट विक्रमादित्य, राजा भोज, सम्राट अशोक के समय भी साहित्य में उज्जैन का उल्लेख कई जगह मिलता है। जब सिंधिया ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया तब उन्होंने उज्जैन में कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया और कई नए मंदिर बनाएं। गोपाल मंदिर नहीं नए बने हुए मंदिरों में से एक है जिसे राजमाता जीजाबाई ने बनवाया था। यह भगवान श्री कृष्ण के द्वारकाधीश स्वरूप को लेकर मनाया गया मंदिर है जिसका विग्रह बहुत ही मनमोहक है और द्वारकाधीश भगवान से कृष्ण की छवि को कल शालिग्राम के पत्थर पर प्रदर्शित करती है।

गोपाल मंदिर

गोपाल मंदिर उज्जैन के सबसे व्यस्ततम मार्केट में स्थित है मानो पूरे बाजार के स्वामी भगवान श्री गोपाल है। मंदिर के दाएं और पूजा और भक्ति स्टोर्स बने हुए हैं और मंदिर के बाई तरफ बर्तन बाजार और सराफा बाजार स्थित है। मंदिर के बिल्कुल सामने छत्री चौक है जो उज्जैन के सबसे व्यस्ततम चौराहों में एक है। यहां एक फुटपाथ मार्केट भी लगता है। इस क्षेत्र में सभी तरह के वस्त्र और अलंकरण मिलते हैं।

संसार का एक मात्र ऐसा स्थान है जहां पर हरी -हर मिलन अर्थात भगवान शिव की शाही सवारी जब एक विशेष दिन यहां से निकलती है तो शिव जो और कृष्ण जी का मिलन प्राचीन काल से ही उज्जैन के गोपाल मंदिर में करवाया जाता है।

भगवान कृष्ण यहां पर पूर्व मुख करके विराजमान हैं और एक विशेष प्रकार का हीरा भी यहां पर भगवान की दाढ़ी में लगाया जाता है जो की बेशकीमती है। गोपाल मंदिर में भगवान शिव और गरुड़ की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं।

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